लक्षण भेद से वस्तु भेद॥ स्पष्ट शास्त्र वचन है कि अमुक सिद्धि दुर्लभम् दुष्प्राप्यम्। अतः प्राप्त करने की विधि दुष्कर दुःसाध्य। शास्त्र में अमुक मन्त्र विधि स्वयम करें तो दुष्कर। पर उस श्रम को काटकर बाँटकर विधि को सुकर सुसाध्य बनाने से विधि के लक्षण मे स्पष्ट भेद हो जाएगा। लक्षण भेद से विधि भेद। अर्थात अब नहीं कह सकते यह वही विधि है। वही विधि नहीं तो वह अभीष्ट फल भी प्राप्य नहीं।