योगस्थ: कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
अर्थात्हे धनञ्जय! - तुम योग में स्थित होकर शास्त्रोक्त कर्म करते जाओ। केवल कर्म में आसक्ति का त्याग कर दो और कर्म सिद्ध हो या असिद्ध अर्थात् उसका फल मिले या फिर न मिले, इन दोनों ही अवस्थाओं में अपनी चित्तवृत्ति को समान रखो।
- The Bhagavad Gita 💜
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