मतंग। स्व व्याख्यान। महाभारत अनुशासनपर्व तथा स्कन्दपुराण आवन्त्यखण्ड लिंगमाहात्म्य में मतंग का वृत्तान्त उपलब्ध है। इतिहास पुराण उभय सम्मत कथन है कि घोर तपस्या पश्चात इन्द्रदेव द्वारा मतंग को ऊर्ध्वगति प्राप्त तो हुई पर देहत्याग भी हुआ। इस प्रकार भीष्म तथा इन्द्रदेव दोनों के दुर्लभमिति दुष्प्राप्यमिति कथनों का सत्यापन हुआ तथा मतंग का उत्थान भी हुआ। पुराण में अधिक विवरण है कि अमुक लिंग विशेष के अनुग्रह से यह साध्य था। यांतित्रिविष्टपम् वासोऽक्षयोदिवि इत्यादि वचनों से स्पष्ट किया गया की इस लिंग के दर्शन ध्यान पूजा से अन्य लोगों को भी स्वर्गगति अथवा शाश्वत दिवंगत अवस्था प्राप्त होगी। अर्थात यह दैहिक मृत्यु का वरदान है।