प्र॰। इस प्रसंग में स्थूल शरीर क्या है। उ॰। विवेकचूडामणि। पंचीकृतेभ्यो भूतेभ्यः स्थूलेभ्यः पूर्वकर्मणा। समुत्पन्नमिदं स्थूलं भोगायतनमात्मनः ॥९०॥ अर्थात पूर्वकर्मों के फल भोगने के लिए उत्पन्न यह भौतिक शरीर।
विवेकचूडामणि। विद्धि देहमिदं स्थूलं गृहवद्गृहमेधिनः॥ स्थूलस्य संभवजरामरणानि धर्माः स्थौल्यादयो बहुविधाः शिशुताद्यवस्थाः। वर्णाश्रमादिनियमा बहुधाऽमयाः स्युः पूजावमानबहुमानमुखाविशेषाः ॥९३॥ अर्थात वर्णाश्रम के नियम स्थूल शरीर का है।
विवेकचूडामणि। ब्रवीतिश्रुतिरेतस्य प्रराब्धंफलदर्शनात् ॥४४६॥ गीताभाष्य। सामर्थ्यात् येन कर्मणा शरीरम् आरब्धं तत् प्रवृत्तफलत्वात् उपभोगेनैव क्षीयते।
ये बनावटी बुद्धियाँ अब चार पाँच वर्ष पुराने संचारयन्त्र पर भी चल लेते हैं। बिना जाल संयोजन।
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कालः। अद्य शुक्रवार
विश्वावसु ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी। शकान्त १९४७ वर्षगत पूर्णिमान्त ०३ कृष्ण ११ । चन्द्र उत्तरभाद्रपद। सूर्य वृषभ ग्रीष्म उत्तरायण देवयान। बृहस्पति मिथुन।
विवेकचूडामणि। तस्मान्मनः कारणमस्य जन्तोः बन्धस्य मोक्षस्य च वा विधाने। बन्धस्य हेतुर्मलिनं रजोगुणैर्मोक्षस्य शुद्धं विरजस्तमस्कम् ॥१७६॥ मनः प्रसूते विषयानशेषान्स्थूलात्मना सूक्ष्मतया च भोक्तुः। शरीरवर्णाश्रमजातिभेदान् गुणक्रियाहेतुफलानि नित्यम् ॥१७९॥
कीटोपाख्यान। महाभारते अनुशासनपर्वणि। मोक्ष के मार्ग में कीट भी। ततःसालोक्यमगमद्ब्रह्मणोब्रह्मवित्तमः। अवापचपदंकीटःपार्थब्रह्मसनातनम्। स्वकर्मफलनिर्वृत्तंव्यासस्यवचनात्तदा।
स्मर्त्तव्य। कौटसाक्ष्यं तु कुर्वाणां ॰ ब्राह्मणं तु विवासयेत्। भृगुप्रोक्त अष्टमोऽध्याय एकसौतेईसवाँ सूत्र।
स्वप्रयत्न। श्रीगुरुरुवाच। ऋणमोचनकर्तारः पितुः सन्ति सुतादयः। बन्धमोचनकर्त्ता तु स्वस्मादन्यो न कश्चन॥ मस्तकन्यस्तभारादेर्दुःखमन्यैर्निवार्यते। क्षुधादिकृतदुःखं तु विनास्वेन न केनचित्॥ पथ्यमौषधसेवा च क्रियते येन रोगिणा। आरोग्यसिद्धिर्दृष्टास्य नान्यानुष्ठितकर्मणा॥ विवेकचूडामणि में।
आयशरीरम्। समाहर्ता दुर्गं राष्ट्रं खनिं सेतुं वनं व्रजं वणिक्पथं चावेक्षेत। शुल्कं दण्डः इत्यादि दुर्गम्। भागो करो इत्यादि राष्ट्रम्॥ धान्यषड्भागं पण्यदशभागं हिरण्यं चास्य भागधेयं प्रकल्पयामासुः॥ बाह्यमाभ्यन्तरं चातिथ्यं निष्क्राम्यं प्रवेश्यं च शुल्कम्। प्रवेश्यानां मूल्यपंचभागः। द्वारादेयं शुल्कपंचभागः॥ इतिकौटलीयार्थशास्त्रे॥
प्रारब्ध। अर्थात आरम्भ किया हुआ। शरीरारम्भकादृष्टविशेषः॥ अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्। पुराणों में। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा। गीता में। प्रारब्धकर्मणां भोगादेव क्षय इति। तत्त्वबोध में॥ निष्कर्षतः। पाप के नाश से प्रवृत्ति का नाश नहीं। प्रवृत्ति के नाश से प्रारब्ध का नाश नहीं।
कालः। अद्य शुक्रवार
क्रोधी चैत्र कृष्ण सप्तमी। शकान्त १९४६ गत पूर्णिमान्त ०१ कृष्ण ०७ । चन्द्र ज्येष्ठा। सूर्य मीन वसन्त उत्तरायण देवयान। बृहस्पति वृषभ।
अरुष। गमनशीले अश्वादौ वेदे। अक्रोधी। चक्कर काटनेवाला जैसे घोडा।
https://en.m.wiktionary.org/wiki/horse#English
https://en.m.wiktionary.org/wiki/%D0%BB%D0%BE%D1%88%D0%B0%D0%B4%D1%8C#Russian
"The translation of modern European scientific terminology into Chinese was carried out methodologically a century ago as part of the New Culture Movement. It went hand in hand with the development of the modern Chinese language itself. There weren’t direct equivalences for subjects like “physics” and “chemistry” or terms like “particle” or “quantum” in classical Chinese; everything needed to be defined, explained, and named. The Chinese intellectuals who learned and spread the knowledge of Western science via translation essentially reinvented the Chinese language. As a result, almost every science term that I have ever had to translate into English already has a specific corresponding word at hand. I only need to translate back what had already been translated into Chinese a century ago."
आर्याक्रमणवाद। शास्त्र प्रमाण है कि भारतीय वैदिक सभ्यता का उद्गम सरस्वती दृषद्वती नदियों के बीच ब्रह्मावर्त नामक भूभाग में हुआ। भौतिक प्रमाण है कि सरस्वती नदी लगभग चार सहस्र वर्ष पूर्व लुप्त हुई। एैतिहासिक प्रमाण है कि बाहरी क्षेत्रों से शक हूण तुरुष्क आदि आगन्तुक थे परन्तु भाषा पर बहुत प्रभावी नहीं। सम्भावना है कि भारतमूल प्रवासी वणिक अथवा जनजातियों का इन बाहरी क्षेत्रों पर भाषागत शैक्षणिक प्रभाव बहुत पहले से था।
खण्डत्ववाद में तरंग समीकरण। यीखत्राम्शावका तु व्यखव हृद्विमा घ्नत्रद्व्यम्शावया सस्थत्र॥ यी ऋणएकमूल। ख खण्डत्व अविकारी अस्रीयद्रव्यगति प्रकार। त्र तरंगकलन देशकाल निर्भर। का काल विकारी। या अक्षीय स्थान विकारी। अम्शाव आम्शिक अवकलन। खव ख वर्ग। मा द्रव्यमान। स्थ स्थितिज ऊर्जाकलन देशकाल निर्भर।
वस्तुतः भाषा में स व्य इत्यादि उपसर्ग जोडने की शैली सामान्य है। जैसे कि दो तु एक सएक। यह भी संश्रृंखल कलन लेखन है तथा बिना कोष्ठक के भी स्पष्ट अर्थ। इस लेखन विधि में चतुर्थ समीकरण। चुपरि तु व्यम्शावका घ्नविशील सविघन घ्नचुशील।
विद्युत्चुम्बकीय समीकरण। विब तु विघन विशील हृ। विपरि तु च्वम्शावका व्य। चुब तु शून्य। चुपरि तु व्यम्शावका विशील घ्न विघन स चुशील घ्न॥ विस्तृततः। विद्युत्क्षेत्रस्य बहिर्वाहघनत्व तु विद्युत्भारघनत्व विद्युत्शीलता हृ। विद्युत्क्षेत्रस्य परिचलनघनत्व तु चुम्बकक्षेत्राम्शावका व्य। चुम्बकक्षेत्रस्य बहिर्वाहघनत्व तु शून्य। चुम्बकक्षेत्रस्य परिचलनघनत्व तु विद्युतक्षेत्राम्शावका विद्युत्शीलता घ्न विद्युत्भारघनत्व स चुम्बकशीलता घ्न॥ अम्शावका अर्थात काल सापेक्ष आम्शिक अवकलन। लेखन विधि बिना कोष्ठक संश्रृंखल क्रमलेख भाषावत जैसे कि दो तु एक एक स।

